विस्तृत उत्तर
## वेदों में ध्यान का महत्व
वेदों में 'धी' — ध्यान की अवधारणा: ऋग्वेद में 'धी' शब्द बार-बार आता है — मेधा, बुद्धि, ध्यान-शक्ति। गायत्री मंत्र में 'धियो यो नः प्रचोदयात्' — हमारी धी (ध्यान-बुद्धि) को प्रेरित करे — यह ध्यान की प्रार्थना है।
नासदीय सूक्त में ध्यान (10/129/3): 'तपसस्तन्महिनाजायतैकम्।' — तप (ध्यान-तप) की महिमा से वह एक (ब्रह्म) प्रकट हुआ। ध्यान को सृष्टि का आदि-कारण माना गया है।
ऋग्वेद (1/164/39): 'ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्।' — जो परम आकाश में मन को स्थिर नहीं करता, उसे वेद-मंत्र क्या करेंगी? मंत्र का फल ध्यान से ही मिलता है।
वैदिक ध्यान-साधना के रूप
- ▸मंत्र-ध्यान: वेद-मंत्र के अर्थ में डूब जाना
- ▸अग्नि-ध्यान: यज्ञाग्नि की दीप्त लौ पर एकाग्रता
- ▸सूर्य-ध्यान: गायत्री के साथ उगते सूर्य पर ध्यान
- ▸ब्रह्म-ध्यान: अथर्ववेद (11/8/23) में हृदय-आकाश में ब्रह्म का ध्यान
वेदाध्ययन = ध्यान: तैत्तिरीय उपनिषद में 'स्वाध्यायान्मा प्रमदः' — वेद-मंत्रों के मनन-ध्यान का आदेश है।





