विस्तृत उत्तर
शिव के 'अघोर' स्वरूप का अर्थ है — जो किसी के लिए भी घोर (भयंकर) नहीं है, जो सबके लिए सुलभ और कल्याणकारी है। अघोर वास्तव में शिव का अत्यंत शांत और अनुग्राही स्वरूप है — न कि भयंकर। 'अ+घोर' = जो घोर नहीं है, जो सहज है।
शिव के अघोर स्वरूप का मुख्य वैदिक मंत्र शुक्लयजुर्वेद के शतरुद्रीय (रुद्राष्टाध्यायी) से है:
ॐ अघोरेभ्यो अथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः।
सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः॥
हिंदी अर्थ: जो अघोर (शांत) रूपों में हैं, जो घोर (उग्र) रूपों में हैं, जो घोर से भी अत्यंत घोरतर रूपों में हैं — सभी प्रकार के शर्व-रूपों को नमस्कार। हे रुद्ररूप शिव! आपके समस्त स्वरूपों को नमस्कार।
साधना का तांत्रिक मंत्र:
॥ ॐ ह्रां ह्रीं हूं अघोरेभ्यो सर्वसिद्धिं देहि देहि अघोरेश्वराय हूं ह्रीं ह्रां ॐ फट् ॥
सरल साधना-मंत्र: ॐ ह्रौं अघोर शिवाय नमः
इस मंत्र में 'ह्रौं' अघोर शिव का बीज है जो शक्ति और सुरक्षा से जोड़ा जाता है।
अघोर परम्परा एक प्राचीन शैव-शाक्त साधना-धारा है। उसका केन्द्रीय सिद्धान्त है कि ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है — श्मशान में भी, मंदिर में भी। अघोर साधना गुरु-दीक्षा के बिना नहीं की जाती।





