विस्तृत उत्तर
काशी का दारा नगर, विशेश्वरगंज और समीपवर्ती मणिकर्णिका घाट क्षेत्र प्राचीन काल से अघोर, वामाचार और तंत्र साधना का महान केंद्र रहा है। महाकालेश्वर अपनी उग्र, संहारक और मृत्युंजय प्रकृति के कारण अघोरियों और तांत्रिकों के लिए सर्वोच्च साधना स्थल है। अघोर साधना में भस्म को हर भौतिक वस्तु की अंतिम और सबसे शुद्ध अवस्था माना जाता है, इसलिए भस्म-प्रिय महाकालेश्वर अघोरियों के आराध्य हैं।
स्वच्छंद तंत्र और रुद्रयामल तंत्र के अनुसार अघोर पंथ में 'अघोर ध्यान मंत्र' (अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो...) का अत्यधिक महत्त्व है। इस मंत्र का जप महाकालेश्वर लिंग या श्मशान के एकांत में किया जाता है। साधक भृकुटी में दिगंबर और कालकूट विष धारण किए महाकाल का ध्यान करते हैं। इससे साधक के अवचेतन का भय और पूर्व-जन्म के सघन कर्म-बंधन भस्म हो जाते हैं, द्वैत मिट जाता है, और उसे काल-स्तम्भन का अनुभव होता है।





