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ग्रहण विधि📜 धर्मसिंधु, स्मृतिग्रंथ, आयुर्वेद2 मिनट पठन

ग्रहण काल में भोजन क्यों नहीं करना चाहिए?

संक्षिप्त उत्तर

ग्रहण भोजन वर्जित: धार्मिक — सूतक/अशुद्धि काल, पुण्यकाल में जप-तप करें। व्यावहारिक — सूक्ष्मजीव वृद्धि, पाचन प्रभाव, उपवास लाभ। सुरक्षा: पूर्व भोजन में तुलसी डालें, बाद में ताजा बनाएँ। रोगी/गर्भवती को छूट।

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विस्तृत उत्तर

ग्रहण काल में भोजन न करने का विधान शास्त्रों में स्पष्ट है। इसके पीछे धार्मिक और व्यावहारिक दोनों कारण हैं:

धार्मिक कारण

  1. 1सूतक (अशुद्धि काल): ग्रहण काल सूतक (वेध) काल है — इस समय वातावरण अशुद्ध माना जाता है। अशुद्ध काल में भोजन करने से शरीर और मन दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
  1. 1जप-तप का समय: ग्रहण काल पुण्यकाल है — इस समय भोजन छोड़कर जप-ध्यान करने से करोड़गुना फल मिलता है। भोजन करना = पुण्यकाल का दुरुपयोग।
  1. 1राहु-केतु का प्रभाव: ग्रहण राहु (छाया ग्रह) द्वारा सूर्य/चन्द्र को ग्रसने की घटना है। इस समय नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव माना जाता है।

आयुर्वेदिक/व्यावहारिक कारण

  1. 1सूक्ष्मजीव वृद्धि: कुछ विद्वानों के अनुसार ग्रहण काल में सूर्य प्रकाश की तीव्रता में परिवर्तन होता है, जिससे भोजन में सूक्ष्मजीवों की वृद्धि हो सकती है।
  1. 1पाचन प्रभाव: ग्रहण काल में गुरुत्वाकर्षण में सूक्ष्म परिवर्तन होता है जो पाचन तंत्र को प्रभावित कर सकता है।
  1. 1उपवास लाभ: ग्रहण काल का उपवास शरीर को विश्राम देता है और विषमुक्ति (detox) में सहायक।

सुरक्षा उपाय

  • ग्रहण से पूर्व बने भोजन में तुलसी पत्र, कुश डाल दें — भोजन अशुद्ध नहीं होता।
  • ग्रहण के बाद ताजा भोजन बनाएँ।
  • रोगी, गर्भवती, बच्चे — आवश्यकता पड़ने पर भोजन ले सकते हैं (स्वास्थ्य सर्वोपरि)।
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शास्त्रीय स्रोत
धर्मसिंधु, स्मृतिग्रंथ, आयुर्वेद
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