विस्तृत उत्तर
माँ मातंगी की साधना में 'उच्छिष्ट' (जूठन) का प्रयोग और चांडालिनी स्वरूप स्पष्ट रूप से वामाचार की ओर संकेत करते हैं। यह सामाजिक और पारंपरिक शुद्धता की अवधारणाओं का अतिक्रमण है।
कर्ण मातंगी साधना को दक्षिणाचार या वामाचार दोनों विधियों से किया जा सकता है।
सुमुखी मातंगी कवच के विधान में रजस्वला स्त्री के स्पर्श और उसके वस्त्र के होम का उल्लेख मिलता है, जो स्पष्ट रूप से वामाचारी तांत्रिक क्रिया है।
उच्छिष्ट' को स्वीकार करने और उसे साधना का अंग बनाने से साधक शुद्धता-अशुद्धता के द्वंद्व से ऊपर उठता है, जिससे उसे सामाजिक और मानसिक बंधनों से मुक्ति मिलती है।





