विस्तृत उत्तर
कुछ परंपराओं में, जैसे उच्छिष्ट मातंगी साधना, जूठे मुंह जप करने का विधान है, जो सामान्य शुद्धता के नियमों के विपरीत है और तांत्रिक मार्ग की विशिष्टता को दर्शाता है।
उच्छिष्ट' को स्वीकार करने और उसे साधना का अंग बनाने से साधक शुद्धता-अशुद्धता के द्वंद्व से ऊपर उठता है, जिससे उसे सामाजिक और मानसिक बंधनों से मुक्ति मिलती है और वह गहन तांत्रिक ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम होता है।
सुमुखी मातंगी साधना में भी जूठे मुंह आठ हजार जप करने का विधान है।





