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जप आसन📜 भगवद् गीता (6.11-12), पातंजल योग सूत्र — आसन, मंत्र महोदधि2 मिनट पठन

मंत्र जप करते समय कौन सा आसन सही है?

संक्षिप्त उत्तर

जप आसन: कुश या ऊनी — भूमि पर सीधे नहीं (ऊर्जा absorb हो जाती है)। मुद्रा: सिद्धासन या सुखासन — रीढ़ सीधी। गीता 6.11: 'न अधिक ऊँचा, न नीचा, स्थिर।' एक ही आसन नित्य उपयोग करें — सिद्ध होता है।

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विस्तृत उत्तर

जप आसन का वर्णन भगवद् गीता, पातंजल योग सूत्र और मंत्र महोदधि में मिलता है:

भगवद् गीता (6.11-12)

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः। नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्।

— शुद्ध स्थान पर, न अधिक ऊँचा न नीचा, वस्त्र-मृगचर्म-कुश के आसन पर स्थिरता से बैठें।

श्रेष्ठ आसन (क्रम में)

| आसन | महत्व |

|-----|-------|

| कुश आसन | वैदिक परंपरा में सर्वोत्तम |

| मृगचर्म | ध्यान और सिद्धि के लिए |

| ऊनी कंबल | सामान्य जप के लिए |

| रेशमी आसन | उत्तम, किंतु महँगा |

बैठने की मुद्रा

  1. 1पद्मासन — उच्च जप के लिए, रीढ़ सीधी
  2. 2सिद्धासन — जप और ध्यान दोनों के लिए श्रेष्ठ
  3. 3सुखासन (पालथी) — सामान्य और सुलभ
  4. 4वज्रासन — यदि पैर दर्द करें

भूमि पर सीधे न बैठें

मंत्र महोदधि: पृथ्वी जप की ऊर्जा को absorb कर लेती है — आसन अनिवार्य है।

रीढ़ सीधी रखें

रीढ़ सीधी हो तो प्राण शक्ति ऊपर की ओर प्रवाहित होती है — जप अधिक प्रभावकारी।

एक आसन — नित्य

एक ही आसन पर नित्य जप करें — वह आसन 'सिद्ध' हो जाता है।

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शास्त्रीय स्रोत
भगवद् गीता (6.11-12), पातंजल योग सूत्र — आसन, मंत्र महोदधि
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