विस्तृत उत्तर
तीर्थ प्राशन पूजा की अंतिम क्रिया है।
पूजा के जल (तीर्थ) को दाहिने हाथ की गोकर्ण मुद्रा (गाय के कान के समान) बनाकर ग्रहण किया जाता है।
यह भैरव की ऊर्जा को साधक के भीतर आत्मसात करने की अंतिम क्रिया है।
तीर्थ प्राशन: पूजा के जल को दाहिने हाथ की गोकर्ण मुद्रा (गाय के कान जैसी) बनाकर ग्रहण करें — यह भैरव की ऊर्जा को भीतर आत्मसात करने की अंतिम क्रिया है।
तीर्थ प्राशन पूजा की अंतिम क्रिया है।
पूजा के जल (तीर्थ) को दाहिने हाथ की गोकर्ण मुद्रा (गाय के कान के समान) बनाकर ग्रहण किया जाता है।
यह भैरव की ऊर्जा को साधक के भीतर आत्मसात करने की अंतिम क्रिया है।
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