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विस्तृत उत्तर
वासुकी नाग के मुख से विष मंथन के तीव्र श्रम और घर्षण के कारण निकला। देवता और असुर उसे बार-बार आगे-पीछे खींच रहे थे, जिससे वासुकी को अत्यधिक पीड़ा और थकान हुई। उसके मुख से गर्म श्वास, धुआं और विषैली फुफकार निकलने लगी। असुरों ने मुख की ओर खड़े होने का आग्रह किया था, इसलिए वे इसी विष और धुएं से झुलस गए। यह प्रसंग बताता है कि अहंकार से चुना गया आकर्षक स्थान हमेशा लाभकारी नहीं होता। बाहरी सम्मान की चाह कभी-कभी भीतर छिपे विष का सामना करा देती है।
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