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विस्तृत उत्तर
वारुणी देवी समुद्र मंथन से प्रकट हुईं और असुरों ने उन्हें स्वीकार किया। वारुणी को मदिरा या मद की देवी माना जाता है। उनका संबंध आसक्ति, नशा और भोग की प्रवृत्ति से जोड़ा जाता है। देवताओं ने उन्हें ग्रहण नहीं किया, क्योंकि उनका लक्ष्य अमृत और धर्म की शक्ति था। असुरों ने भोग और मद से जुड़ी प्रकृति के कारण वारुणी को सहर्ष स्वीकार किया। यह प्रसंग देव और असुरों की प्रवृत्ति का अंतर दिखाता है: देवता संयम और अमृत की ओर, असुर मद और भोग की ओर आकर्षित होते हैं।
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