विस्तृत उत्तर
साधना के मार्ग पर सबसे बड़ा अवरोध भक्त-अपराध माना जाता है।
किसी भी वैष्णव, संत, उपासक, या भक्त की निंदा या अपमान करना सभी सुकृतों (पुण्यों) को नष्ट कर देता है, भले ही साधक कितनी भी उच्च पदवी पर क्यों न हो।
भगवान शिव स्वयं मर्यादाओं और सिद्धांतों का उल्लंघन पसंद नहीं करते। अतः, इस उग्र मंत्र की साधना करते समय मन में दंभ, पाखंड, या दूसरों के प्रति द्वेष नहीं होना चाहिए। साधक को अपने हृदय को शुद्ध रखना अनिवार्य है।





