विस्तृत उत्तर
भागवत कथा में निंदा से बचना वाणी की शुद्धि का नियम है। पाठ में कहा गया है कि कथा सुनने वाले को वेद, वैष्णव, ब्राह्मण, गुरु, गोसेवक, स्त्री, राजा और महापुरुषों की निंदा से बचना चाहिए। कथा के सात दिन श्रोता को शुद्ध चित्त, संयमित आहार और शांत मन के साथ रहना है। निंदा मन को दोष-दर्शन, अहंकार और कठोरता में ले जाती है, जबकि कथा का उद्देश्य भक्ति, विनय और शुद्धता है। इसी कारण निंदा के साथ-साथ काम, क्रोध, लोभ, दंभ, मोह और द्वेष भी त्याज्य बताए गए हैं। वाणी को व्यर्थ बात और निंदा से हटाकर कीर्तन, कथा-श्रवण और भगवान के गुणों में लगाना चाहिए।
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