विस्तृत उत्तर
हरे कृष्ण महामंत्र का मूल स्रोत 'कलि-संतरण उपनिषद' है — यह वैदिक उपनिषद परंपरा का ग्रंथ है जो कृष्ण यजुर्वेद के अंतर्गत आता है।
महामंत्र है —
हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे।।'
कलि-संतरण उपनिषद में नारद और ब्रह्माजी का एक संवाद है जिसमें नारद ने पूछा — 'कलियुग के दोषों से कैसे पार पाएंगे?' ब्रह्माजी ने उत्तर दिया — 'भगवान नारायण के पवित्र नामों का जप ही एकमात्र मार्ग है।' इसी संदर्भ में यह 16-नाम, 32-अक्षर महामंत्र दिया गया।
इस उपनिषद का वचन है — 'इति षोडषकं नाम्नं कलि-कल्मष-नाशनम्। नातः परतरोपायः सर्व-वेदेषु दृश्यते।।' — कलियुग के पापों को नष्ट करने के लिए ये 16 नाम ही हैं, सभी वेदों में इससे श्रेष्ठ कोई उपाय नहीं।
15वीं शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु ने इस महामंत्र को भक्ति-आंदोलन के केंद्र में रखा और संकीर्तन-परंपरा से इसे घर-घर पहुँचाया। उनका कहना था — 'नाम ही नामी है' — नाम और नामी में कोई अंतर नहीं।
20वीं सदी में श्रील प्रभुपाद ने इसे विश्वव्यापी बनाया।
तीन नामों का अर्थ — 'हरे' = हरि की ऊर्जा (राधा/शक्ति) को पुकारना, 'कृष्ण' = परम आकर्षक भगवान, 'राम' = आनंद के स्वामी।





