विस्तृत उत्तर
तुलसीदासजी ने राम नाम को शिवजी का प्राणप्रिय इसलिये कहा क्योंकि शिवजी स्वयं इस महामंत्र का सदा जप करते हैं और काशी में मरते हुए प्राणियों को मुक्ति के लिये यही नाम उपदेश करते हैं।
चौपाई — 'महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू। महिमा जासु जान गनराऊ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ॥'
इसका अर्थ — जो महामन्त्र है, जिसे महेश्वर श्रीशिवजी जपते हैं और उनके द्वारा जिसका उपदेश काशीमें मुक्तिका कारण है, तथा जिसकी महिमाको गणेशजी जानते हैं, जो इस 'राम' नामके प्रभावसे ही सबसे पहले पूजे जाते हैं।
साथ ही कहा — 'जान आदिकबि नाम प्रतापू। भयउ सुद्ध करि उलटा जापू॥ सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेई पिय संग भवानी॥'
अर्थ — आदिकवि श्रीवाल्मीकिजी रामनामके प्रतापको जानते हैं, जो उलटा नाम ('मरा', 'मरा') जपकर पवित्र हो गये। श्रीशिवजीके इस वचनको सुनकर कि एक राम-नाम सहस्र (हज़ार) नामके समान है, पार्वतीजी सदा अपने पति (श्रीशिवजी) के साथ रामनामका जप करती रहती हैं।
इस प्रकार शिवजी स्वयं रामनाम जपते हैं, काशी में इसका उपदेश करते हैं, और एक रामनाम को विष्णु सहस्रनाम के तुल्य मानते हैं।





