विस्तृत उत्तर
भारतीय धर्मशास्त्रों में यह स्पष्ट उद्घोष है कि कोई भी यज्ञ, अनुष्ठान या संस्कार तब तक निष्फल रहता है जब तक कि उसमें उचित दान-दक्षिणा का विधान न किया जाए।
यजमान को चाहिए कि वह यज्ञ संपन्न कराने वाले आचार्य (पुरोहित) का आदरपूर्वक सत्कार करे। दान सामग्री में धोती, दुपट्टा, अंगोछा, पंचपात्र, यज्ञोपवीत, आसन, फल, मिष्ठान और यथायोग्य सुवर्ण या रजत (धन) दक्षिणा के रूप में अवश्य देना चाहिए।
अंत में समस्त उपस्थित मण्डली को प्रसाद वितरित कर आरती की जाती है।





