विस्तृत उत्तर
यज्ञ की चरम परिणति पूर्णाहुति है। यह इस बात का दार्शनिक प्रतीक है कि परमात्मा पूर्ण है, यह सृष्टि पूर्ण है, और यह यज्ञ भी अपने चरम रूप में पूर्ण है।
थाली में बची हुई सम्पूर्ण हवन सामग्री, घृत, पान, सुपारी, लौंग, इलायची और गोला (सूखा नारियल) को एक साथ वेदी में समर्पित कर दिया जाता है। नारियल (श्रीफल) का समर्पण अपने भीतर के संपूर्ण अहंकार और मलिनता को अग्नि में होम कर देने का प्रतीक है।
मन्त्र: 'ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ ॐ सर्वं वै पूर्णं स्वाहा॥' (इस मंत्र की तीन बार आहुति दी जाती है)।
भावार्थ: वह परब्रह्म पूर्ण है, यह चराचर जगत् भी पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण की उत्पत्ति होती है, और पूर्ण में से पूर्ण को निकाल लेने पर भी अंत में पूर्ण ही शेष बचता है।
