विस्तृत उत्तर
भागवत पुस्तक की पूजा बड़े उत्साह और प्रेम से धूप, दीप आदि सामग्री सहित विधिपूर्वक करनी चाहिए। पुस्तक के आगे नारियल रखकर नमस्कार किया जाता है और सच्चे चित्त से स्तुति की जाती है। स्तुति का भाव यह है कि श्रीमद्भागवत के रूप में साक्षात श्रीकृष्ण विराजमान हैं; भवसागर से छूटने के लिये मैंने आपकी शरण ली है, मेरे मनोरथ को बिना विघ्न पूर्ण कीजिए, मैं आपका दास हूँ। सप्ताह समाप्त होने पर भी श्रोता को अत्यंत भक्ति से पुस्तक और वक्ता की पूजा करनी चाहिए। इससे भागवत पुस्तक को केवल ग्रंथ नहीं, श्रीकृष्णस्वरूप, पूजा योग्य और मुक्ति-साधन माना गया है।
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