विस्तृत उत्तर
शास्त्रीय मान्यता है कि यज्ञ का फल तब तक सुरक्षित नहीं होता जब तक आसन के नीचे जल लगाकर इन्द्र को वंदन न किया जाए।
यजमान अपने आसन के नीचे भूमि पर थोड़ा जल छोड़ता है और उस जल को अनामिका उंगली से स्पर्श कर अपने मस्तक और नेत्रों पर लगाता है।
मन्त्र: 'ॐ इन्द्राय नमः' अथवा 'ॐ शक्राय नमः।'
यदि यह क्रिया न की जाए, तो मान्यता है कि देवराज इन्द्र उस यज्ञ का सम्पूर्ण पुण्य फल हर लेते हैं।





