विस्तृत उत्तर
देवताओं द्वारा प्रदान किए गए अस्त्र-शस्त्रों और आभूषणों को धारण करने के पश्चात, भगवती दुर्गा ने अट्टहास करते हुए अत्यंत उच्च स्वर में भयंकर गर्जना की। देवी के उस प्रलयंकारी नाद से संपूर्ण आकाश और पृथ्वी गुंजायमान हो उठे, ब्रह्मांड काँप उठा और समुद्र उफान पर आ गए। इस भयंकर ध्वनि को सुनकर महिषासुर ने अपनी विशाल असुर सेना को एकत्र किया।
जब महिषासुर और उसके सेनापतियों (चिक्षुर, चामर, उदग्र, महाहनु आदि) ने देवी पर आक्रमण किया, तो देवी ने अपने त्रिशूल, गदा और शक्ति का प्रयोग करते हुए चतुरंगिणी सेना का संहार करना आरंभ कर दिया।
जब महिषासुर ने देखा कि उसकी सेना नष्ट हो रही है, तो वह स्वयं युद्ध भूमि में आ गया। उसने भैंसे, सिंह, हाथी आदि अनेक रूप धारण किए। देवी ने उसके प्रत्येक रूप को परास्त किया। अंत में महिषासुर ने पुनः भैंसे का रूप धारण कर लिया। देवी भगवती अत्यंत क्रोधित हो उठीं, उन्होंने सुरापान किया और उछलकर महिषासुर की छाती पर अपना पैर रख दिया। जैसे ही असुर अपने मूल स्वरूप में भैंसे के मुख से आधा बाहर निकला, देवी ने अपने खड्ग (तलवार) से उसका मस्तक काट गिराया। इसी कारण माँ दुर्गा को 'महिषासुरमर्दिनी' के नाम से जाना जाता है।





