विस्तृत उत्तर
शाक्त परंपरा और उपनिषदों के आलोक में महिषासुर का वध केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक कथा नहीं है, अपितु यह मानव मन के भीतर चल रहे शाश्वत युद्ध का एक सशक्त प्रतीक है।
महिष' (भैंसा) मूल रूप से आलस्य, अज्ञान, अंधकार और तमस (तमोगुण) का प्रतीक है। असुर कोई बाहरी शक्ति नहीं, बल्कि हमारे ही भीतर निवास करने वाले पाँच प्रमुख विकार हैं — काम, क्रोध, लोभ, मोह, और अहंकार। महिषासुर का बार-बार रूप बदलना इंसान के अहंकार और मायावी वृत्तियों के रंग बदलने का प्रतीक है; कभी वह क्रोध (सिंह) बन जाता है, कभी लालच (हाथी) और कभी घोर जड़ता (भैंसा)।
देवी द्वारा महिषासुर का मर्दन इस बात का संकेत है कि जब कोई साधक अपने भीतर के 'पशुत्व' और 'अहंकार' को देवी के चरणों में समर्पित कर देता है, तभी उसके मलिन अंतःकरण की शुद्धि होती है। मोक्ष कोई नई वस्तु प्राप्त करना नहीं है, बल्कि उस परम चेतना (देवी) को पहचानना है जो हमारे भीतर सदा से विद्यमान थी। महिषासुर का वध मनुष्य के भीतर के उसी अज्ञान रूपी महिषासुर का वध है।





