विस्तृत उत्तर
महोदरेश्वर शिवलिंग को ऐतिहासिक और तांत्रिक, दोनों ही दृष्टियों से काशी का 'गुप्त लिंग' माना जाता है। ऐतिहासिक रूप से, मुगल काल (विशेषकर १६६९ ईस्वी में औरंगजेब के आक्रमण) में आक्रांताओं से सनातन धरोहरों को बचाने के लिए काशी के निवासियों ने कई जाग्रत शिवलिंगों को भूमिगत कर दिया या तहखानों में छुपा दिया था। भौतिक गुप्तता ने इनकी पवित्रता बचाए रखी।
वहीं, तांत्रिक और तात्त्विक दृष्टिकोण से 'गुप्त लिंग' अव्यक्त चेतना और सुप्त कुंडलिनी ऊर्जा (सुषुम्ना नाड़ी) का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनकी ऊर्जा बहिर्मुखी नहीं होती, बल्कि एक 'एनर्जी वॉर्टेक्स' की तरह कार्य करती है जो साधक की चेतना को भौतिकता से शून्यता (भीतर) की ओर खींचती है। जो साधक इंद्रियों को बाहरी विषयों से समेट कर पूर्ण मौन और एकाग्रता में शिव को खोजता है, उसी के लिए यह लिंग ऊर्जा प्रकट करता है।





