विस्तृत उत्तर
कूर्म पुराण और शिव पुराण के अनुसार, सोमनंदी प्रारंभ से शांत तपस्वी नहीं थे; वे एक अत्यंत उग्र और भयंकर योद्धा थे जिन्होंने अंधकासुर के साथ देवासुर संग्राम में भाग लिया था। उनका यह स्वरूप रजोगुण और तमोगुण से मिश्रित उग्र ऊर्जा का प्रतीक था।
परंतु जब वे काशी के नंदीवन में प्रविष्ट हुए, तो यहाँ की आध्यात्मिक ऊर्जा ने उनके रजोगुण और तमोगुण को पूर्णतः भस्म कर दिया। वह उग्र योद्धा एक परम शांत, ध्यान-मग्न मुनि में रूपांतरित हो गया। दार्शनिक दृष्टि से शिव का 'गण' मानव-मन की उग्र और अनियंत्रित वृत्तियों का प्रतीक है। 'तपस्या-स्थल' का अर्थ वह स्थान है जहाँ आंतरिक ऊष्मा (तप) के माध्यम से निम्न प्रवृत्तियाँ उच्च चेतना में परिवर्तित होती हैं। जो भी आर्त साधक अपने मन की उग्रता, अनियंत्रित क्रोध, अवसाद या भटकाव से पीड़ित होकर यहाँ शिव-ध्यान करता है, उसकी उग्र वृत्तियों का शमन स्वतः हो जाता है।





