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विस्तृत उत्तर
पितर दो प्रकार के बताए गए हैं: अयज्वा और यज्वा। पाठ में दोनों को प्रसन्न मनवाले पितर कहा गया है। यज्वा अर्थात् यज्ञ करने वाले पितरों को अग्निष्वात्त कहा गया है, और अयज्वा पितरों को बर्हिषद कहा गया है। इसलिए पितरों का मूल विभाजन यज्ञ करने और न करने की स्थिति से जुड़ा बताया गया है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 6, PDF पृष्ठ 34, श्लोक 5
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