विस्तृत उत्तर
आत्मदेव संन्यासी के सामने संतान न होने के कारण रोते हैं। जब संन्यासी उनसे चिंता का कारण पूछते हैं, तो आत्मदेव कहते हैं कि वे अपने पूर्वजन्म के पाप से संचित दुख का वर्णन कैसे करें। वे कहते हैं कि उनके पितर उनकी चिंता से गर्म हुई जलांजलि पीते हैं और देवता तथा ब्राह्मण उनके दान को प्रसन्न मन से स्वीकार नहीं करते। संतान के अभाव से उन्हें सब सूना दिखाई देता है और वे प्राण त्यागने के लिये वहाँ आए हैं। वे अपनी गायों के बाँझ होने, लगाए वृक्षों के फलहीन होने और घर के फलों के जल्दी सड़ जाने का भी दुख कहते हैं। संन्यासी के पास उनका रोना इसी गहरी संतान-वेदना से जुड़ा है।
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