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पूर्णिमा की रात्रि में सोमानंदीश्वर शिवलिंग

पूर्णिमा की रात्रि ब्रह्मांडीय ऊर्जा के ऊर्ध्वगमन और चंद्र-तत्त्व की पूर्णता का समय है।

संक्षिप्त उत्तर

पूर्णिमा की रात्रि ब्रह्मांडीय ऊर्जा के ऊर्ध्वगमन और चंद्र-तत्त्व की पूर्णता का समय है। तंत्र-शास्त्रों के अनुसार इस रात्रि यहाँ कच्चे दूध से अभिषेक करने पर अनिद्रा, अवसाद और अज्ञात भय दूर होते हैं।

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विस्तृत उत्तर

पूर्णिमा चंद्रमा (सोम) की पूर्णता की तिथि है। तंत्र-शास्त्र और योग-विज्ञान के अनुसार पूर्णिमा की रात्रि में ब्रह्मांडीय ऊर्जा का स्वतः ऊर्ध्वगमन होता है। स्कंद पुराण के काशी खंड (अध्याय 14) में शिव स्वयं कहते हैं कि चंद्र-तत्त्व से जुड़े लिंगों पर पूर्णिमा के दिन किए गए जप, अर्चना और दान से वे अत्यंत प्रसन्न होते हैं।

चूँकि सोमानंदीश्वर लिंग पूर्णतः 'सोम-तत्त्व' और मन-शांति से संबद्ध है, इसलिए पूर्णिमा की मध्यरात्रि में यहाँ गोदुग्ध (कच्चे दूध) से अभिषेक करने की सुदृढ़ शास्त्र-समर्थित लोक-परंपरा है। दूध और चंद्र दोनों का रंग श्वेत है, जो शीतलता के प्रतीक हैं। पूर्णिमा पर यहाँ अभिषेक करने से अज्ञात भय, अनिद्रा, अवसाद और उन्माद जैसी मानसिक समस्याएँ जड़ से समाप्त होती हैं।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

पूर्णिमा की रात्रि में सोमानंदीश्वर शिवलिंग पर दुग्धाभिषेक का क्या तांत्रिक और शास्त्रीय महत्त्व है को संदर्भ सहित समझें

पूर्णिमा की रात्रि में सोमानंदीश्वर शिवलिंग पर दुग्धाभिषेक का क्या तांत्रिक और शास्त्रीय महत्त्व है का सबसे सीधा सार यह है: पूर्णिमा की रात्रि ब्रह्मांडीय ऊर्जा के ऊर्ध्वगमन और चंद्र-तत्त्व की पूर्णता का समय है। तंत्र-शास्त्रों के अनुसार इस रात्रि यहाँ कच्चे दूध से अभिषेक करने पर अनिद्रा, अवसाद...

पूजा विधान और नियम जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.

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