विस्तृत उत्तर
काशी स्वयं माता अन्नपूर्णा की नगरी है, जहाँ शिव पुराण के अनुसार भूखे को भोजन कराना महादेव के त्रिशूल पर हाथ रखने के समान मोक्षदायी है। महोदरेश्वर के 'उदर-तत्त्व' के कारण यहाँ अन्नदान का विशिष्ट तांत्रिक महत्त्व है।
तांत्रिक वांग्मय के अनुसार, यह भूत-शुद्धि की एक आक्रामक प्रक्रिया है। महोदर जैसे उग्र शिव-गणों को अन्न समर्पित करने या उनके निमित्त गरीबों और साधुओं को गुप्त रूप से भोजन कराने से ये सूक्ष्म ऊर्जाएं शांत होती हैं। जब एक भूखा व्यक्ति यहाँ अन्न ग्रहण करता है, तो उसकी तृप्ति की सूक्ष्म तरंगें (Vibrations) सीधे दानकर्ता के कर्म-चक्र तक पहुँचकर उसके प्रारब्ध और पापों को भस्म कर देती हैं। इसके अतिरिक्त, अपनी कमाई का निःस्वार्थ दान 'लोभ-मुक्ति' की पहली सीढ़ी है। यहाँ अन्नदान पूर्णतः अहंकार-शून्य, सात्त्विक और 'गुप्त' होना चाहिए, तभी वह फलित होता है।




