विस्तृत उत्तर
यहाँ साधना के लिए साधक को 'पाशुपत व्रत' या पूर्ण 'ब्रह्मचर्य' का पालन करना अनिवार्य बताया गया है। दर्शन राग-द्वेष से मुक्त होकर, क्षमा और शांति धारण कर करना चाहिए। निषेध के रूप में— चूँकि यह क्षेत्र पिशाचमोचन के निकट है, इसलिए यहाँ अभक्ष्य भक्षण, अशुद्ध अवस्था में प्रवेश और तामसिक प्रवृत्तियों या 'अहंकार' का प्रदर्शन पूर्णतः निषिद्ध है। अहंकारपूर्वक प्रदर्शन यहाँ पतन का कारण बनता है।





