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पूजा विधान और नियम⏱ 1 मिनट पठन

कामिका आगम के अनुसार काशी के महाकालेश्वर सिद्ध लिंग

संक्षिप्त उत्तर

कामिका आगम के अनुसार सिद्ध लिंग ऊर्जा के इतने सघन केंद्र होते हैं कि उनका नैवेद्य साक्षात शिव का प्रसाद बन जाता है, इसलिए इसे ग्रहण करने के लिए चण्डेश्वर की अनुमति या मध्यस्थता अनिवार्य नहीं है।

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विस्तृत उत्तर

सामान्य शिव पूजा विधान में शिव पूजा के पश्चात् शिव के निर्माल्य और नैवेद्य पर 'चण्डेश्वर' (शिव के एक उग्र गण) का अधिकार माना जाता है, और पूजा की पूर्णता के लिए उनकी पूजा अनिवार्य होती है। परंतु, कामिका आगम (पूर्व पाद) स्पष्ट निर्देश देता है कि बाण लिंग, धातु लिंग, स्वयंभू और 'सिद्ध लिंग' की पूजा में चण्डेश्वर की पूजा अनिवार्य नहीं है।

दारा नगर का महाकालेश्वर लिंग एक सिद्ध लिंग है। इसका दार्शनिक और तांत्रिक कारण यह है कि सिद्ध लिंग ऊर्जा के इतने सघन, पूर्ण और जाग्रत केंद्र होते हैं कि उनका नैवेद्य साक्षात शिव का प्रसादरूप हो जाता है। उसे ग्रहण करने के लिए या उनके उग्र तेज को विनियमित करने के लिए किसी मध्यस्थ (चण्डेश्वर) की आवश्यकता नहीं होती। इसका नैवेद्य ग्रहण करने से चांद्रायण व्रत के समान महापुण्य प्राप्त होता है और ब्रह्महत्या जैसे महापाप तत्काल भस्म हो जाते हैं।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

कामिका आगम के अनुसार काशी के महाकालेश्वर सिद्ध लिंग की पूजा में 'चण्डेश्वर पूजा' से छूट क्यों है को संदर्भ सहित समझें

कामिका आगम के अनुसार काशी के महाकालेश्वर सिद्ध लिंग की पूजा में 'चण्डेश्वर पूजा' से छूट क्यों है का सबसे सीधा सार यह है: कामिका आगम के अनुसार सिद्ध लिंग ऊर्जा के इतने सघन केंद्र होते हैं कि उनका नैवेद्य साक्षात शिव का प्रसाद बन जाता है, इसलिए इसे ग्रहण करने के...

पूजा विधान और नियम जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.

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