विस्तृत उत्तर
प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद में सरस्वती को प्रारंभ में उत्तर-पश्चिम भारत में बहने वाली एक अत्यंत पवित्र और जीवनदायिनी नदी (सप्तसिंधु में से एक) के रूप में पूजा जाता था। हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने से वसंत ऋतु में इस नदी का जलस्तर बढ़ जाता था, और इसके तटों पर पीली सरसों के फूल खिल उठते थे।
कालान्तर में जब यह भौतिक नदी विलुप्त होने लगी, तो सनातन दर्शन में सरस्वती का मानवीकरण (Personification) हुआ। उन्हें शुद्धता के प्रतीक से उन्नत करके 'वाक्' (Speech), बुद्धि, कला और चेतना की सर्वोच्च अधिष्ठात्री देवी के रूप में स्थापित किया गया।
यह परिवर्तन भौतिकता (प्रकृति/जल) से आध्यात्मिकता (ज्ञान/प्रज्ञा) की ओर मानव चेतना के विकास को दर्शाता है।
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