तंत्र षट्कर्मतंत्र साधना में अभिचार कर्म क्या होता है?दूसरों को हानि (मंत्र/यंत्र)। मारण/उच्चाटन/विद्वेषण = अभिचार। तामसिक — गंभीर पाप। करने वाले = 3-10 गुना बुरा (कर्म)। पूर्णतः वर्जित। केवल शांति कर्म। अनैतिक+अवैध।#अभिचार#कर्म#क्या
सनातन सिद्धांतपुनर्जन्म क्या है?पुनर्जन्म = कर्म-बंधन के कारण आत्मा का नए शरीर में प्रवेश। गीता 2.22 — पुराना वस्त्र त्याग, नया वस्त्र — आत्मा का रूपक। आत्मा अजन्मा, अमर (कठोपनिषद)। कर्म अनुसार 84 लाख योनियाँ। गरुड़ पुराण में मृत्युपश्चात् यात्रा का वर्णन। मोक्ष = पुनर्जन्म चक्र से मुक्ति।#पुनर्जन्म#आत्मा#जन्म-मृत्यु
सनातन सिद्धांतकर्म सिद्धांत क्या है?कर्म = विचार + वाणी + कर्म। कोई कर्म नष्ट नहीं होता। तीन प्रकार: संचित (पुराने कर्मों का भंडार), प्रारब्ध (इस जन्म का भोग/भाग्य), आगामी (वर्तमान कर्म — भविष्य बदलते हैं)। निष्काम कर्म = मुक्ति। ज्ञान से कर्म नष्ट होते हैं (गीता 4.37)।#कर्म#कर्मफल#संचित कर्म
भगवद गीताभगवद गीता का संदेश क्या है?गीता का केंद्रीय संदेश: कर्म करो, फल की चिंता मत करो (2.47)। आत्मा अमर है। स्वधर्म श्रेष्ठ। कर्म योग + ज्ञान योग + भक्ति योग — तीनों मोक्ष-मार्ग। सुख-दुख में समभाव। अंतिम उपाय — ईश्वर की शरण (18.66)। 18 अध्याय, 700 श्लोक।#गीता#संदेश#कर्म
तंत्र षट्कर्मतंत्र में मारण कर्म क्या है और इसका दुष्प्रभाव क्या होता है?सर्वनिकृष्ट + सर्ववर्जित। दुष्प्रभाव: गंभीर कर्म बंधन, प्रतिघात (परिवार कष्ट), पागलपन, साधना पतन, IPC 302/307 (कानूनी अपराध)। 'जो मारे = वो मरे।' शांति = एकमात्र धर्म। विधि कभी न दें।#मारण#कर्म#क्या
कर्म सिद्धांतकर्म का सिद्धांत क्या है हिंदू धर्म के अनुसार?कर्म सिद्धांत: प्रत्येक क्रिया का फल मिलता है। गीता में कर्मयोग — 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन'। निष्काम कर्म मोक्ष का मार्ग, राग-द्वेष युक्त कर्म बंधनकारी। यह पुरुषार्थ का सिद्धांत है, भाग्यवाद नहीं।#कर्म#कर्म सिद्धांत#हिंदू दर्शन
भक्ति एवं आध्यात्मदान कर रहे हैं पर दरिद्रता दूर नहीं हो रही — कारण क्या है?दान का फल तब अधिक होता है जब — बिना दिखावे के सही पात्र को, सात्विक भाव से दिया जाए (गीता 17.20)। प्रारब्ध कर्म का ऋण चुकाने में समय लगता है। दान के साथ परिश्रम और अनुशासन भी जरूरी है।#दान#दरिद्रता#कर्म
लोकभगवान विष्णु की कर्म वाली कथा क्या है?यह कथा दिखाती है कि कर्म का नियम सब पर समान है।#भगवान विष्णु#कर्म#लक्ष्मी
लोकसृष्टि का बीज क्या होता है?सृष्टि-बीज भावी जगत और जीव-कर्मों का सूक्ष्म पुंज है।#सृष्टि बीज#कर्म#विष्णु
लोकपितृ तत्त्व क्या है?पितृ तत्त्व मृत पूर्वज की वह सूक्ष्म पितृ अवस्था है, जिसमें वह श्राद्ध और सपिण्डीकरण के बाद वसु, रुद्र या आदित्य देव वर्ग से जुड़ता है।#पितृ तत्त्व#श्राद्ध#पितृलोक
लोकवितल लोक का पूरा महत्व क्या है?वितल लोक हाटकेश्वर शिव, हाटकी नदी, हाटक स्वर्ण, भोग-विलास, अज्ञान, कर्म-फल और ईश्वर की सत्ता का महत्वपूर्ण अधोलोक है।#वितल महत्व#हाटकेश्वर शिव#हाटक स्वर्ण
मरणोपरांत आत्मा यात्रामरणोपरांत आत्मा की यात्रा में कर्मों की भूमिका क्या है?कर्म आत्मा की गति तय करते हैं; यमराज चित्रगुप्त के कर्म-लेख के आधार पर स्वर्ग, उच्च लोक या नरक का निर्णय करते हैं।#कर्म#आत्मा यात्रा#यमराज
मरणोपरांत आत्मा यात्रालिंग शरीर क्या होता है?लिंग शरीर सत्रह तत्त्वों से बना सूक्ष्म शरीर है, जो कर्म और संस्कारों का वाहक होता है।#लिंग शरीर#सूक्ष्म शरीर#कर्म
जीवन एवं मृत्युजीवन और मृत्यु का सनातन सिद्धांत क्या है?सनातन सिद्धांत के अनुसार जन्म और मृत्यु एक अखंड चक्र है। आत्मा अजर-अमर है, केवल शरीर बदलता है। कर्मों के अनुसार अगली योनि मिलती है और यह चक्र मोक्ष प्राप्ति तक चलता रहता है।#सनातन सिद्धांत#जीवन मृत्यु#पुनर्जन्म
श्राद्ध एवं पितृ कर्मदसवां कर्म कैसे करें विधि क्या हैदसवां: स्नान → दशगात्र पिंडदान (प्रेत शरीर 10 अंग — गरुड़ पुराण) → तिल-जल → दान (वस्त्र/अन्न) → ब्राह्मण भोज → मुंडन (कुछ परंपरा)। 11वें: एकोद्दिष्ट; 12वें: सपिंडीकरण; 13वें: शुद्धि। कुल पुरोहित अनिवार्य।#दसवां#दशाह#कर्म
हिंदू दर्शनकर्मण्येवाधिकारस्ते श्लोक का सही अर्थ क्या हैगीता 2.47 — (1) कर्म करना तुम्हारे हाथ में है (2) फल तुम्हारे नियंत्रण में नहीं (3) फल की लालसा कर्म का कारण न बने (4) 'फल नहीं तो कर्म क्यों' — यह सोच भी गलत। सार: पूर्ण समर्पण से कर्म करो, परिणाम ईश्वर पर छोड़ो।#गीता#कर्मण्येवाधिकारस्ते#कर्म
शास्त्र ज्ञानउपनिषद में कर्म का सिद्धांत क्या है?बृहदारण्यक (4/4/5) — 'जैसा कर्म, जैसा आचरण — वैसा ही बनता है।' छान्दोग्य (5/10/7) में देवयान और पितृयान — दो कर्म-मार्ग बताए गए हैं। ईशावास्योपनिषद (1-2) में निर्लेप कर्म का संदेश है। ब्रह्मज्ञान से सभी कर्म-बंधन नष्ट होते हैं।#कर्म#उपनिषद#कर्मफल
वेद ज्ञानवेदों में कर्म का महत्व क्या है?वेदों में कर्म केन्द्रीय है। यजुर्वेद (40/2) कहता है — कर्म करते हुए जियो। यज्ञ-कर्म सर्वोत्तम है। शुभ कर्म से स्वर्ग — यह वैदिक कर्मफल-सिद्धांत है। निष्काम कर्म + ज्ञान = मोक्ष — यही वेदांत का निष्कर्ष है।#कर्म#वेद#यज्ञ
गीता दर्शनगीता में कर्म का सिद्धांत क्या है?गीता का कर्म-सिद्धांत (2/47) कहता है — कर्म करो, फल की इच्छा मत करो। निष्काम कर्म, ईश्वर-अर्पण भाव और स्वधर्म-पालन — ये गीता के कर्मयोग के तीन स्तंभ हैं।#कर्म#निष्काम कर्म#कर्मयोग
हिंदू धर्म दर्शनहिंदू धर्म के मुख्य सिद्धांत क्या हैं?हिंदू धर्म के मुख्य सिद्धांत हैं — ब्रह्म की एकता, आत्मा की अमरता, कर्म और पुनर्जन्म का सिद्धांत, मोक्ष को परम लक्ष्य मानना, चार पुरुषार्थ (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष), चार आश्रम और अहिंसा का पालन। ऋग्वेद का 'एकं सत् विप्राः बहुधा वदन्ति' इसका मूल दर्शन है।#हिंदू धर्म#सिद्धांत#धर्म