विस्तृत उत्तर
सनातन धर्म में जीवन और मृत्यु को एक अखंड चक्र के रूप में देखा गया है, जो तब तक चलता रहता है जब तक जीवात्मा को मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो जाती। इस सिद्धांत का मूल आधार यह है — 'जो जन्मा है, वह मरेगा; और जो मरा है, वह फिर जन्म लेगा।' भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने इसे अत्यंत स्पष्ट शब्दों में समझाया है कि आत्मा न कभी जन्म लेती है, न कभी मरती है — केवल शरीर बदलता है, जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है।
गरुड़ पुराण, कठोपनिषद और विष्णु पुराण में यह सिद्धांत और अधिक विस्तार से वर्णित है। आत्मा नित्य, शाश्वत और अजर-अमर है। शरीर पाँच तत्वों — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश — से बना हुआ नश्वर आवरण मात्र है। मृत्यु के समय यह स्थूल शरीर पाँच तत्वों में विलीन हो जाता है, परंतु जीवात्मा अपने सूक्ष्म शरीर के साथ आगे की यात्रा जारी रखती है।
इस जन्म-मरण के चक्र को 'संसार चक्र' कहा गया है। प्रत्येक जीव अपने कर्मों के अनुसार ऊँची या नीची योनियों में जन्म लेता है। पुण्यात्मा ऊर्ध्व गति को प्राप्त होती है, पापात्मा अधोगति को। जिस जीवात्मा ने ज्ञान, भक्ति या निष्काम कर्म के मार्ग से स्वयं को परिशुद्ध कर लिया, उसे इस चक्र से मुक्ति अर्थात मोक्ष मिलता है। यही सनातन धर्म का शाश्वत जीवन-मृत्यु सिद्धांत है।





