विस्तृत उत्तर
देवउठनी एकादशी के दिन संध्याकाल में शंख, घंटा, मृदंग और नगाड़ों की मंगल ध्वनि के साथ भगवान का आवाहन किया जाता है।
'निर्णयसिन्धु', 'धर्मसिन्धु' तथा 'स्कंद पुराण' में भगवान को जगाने के लिए विशिष्ट संस्कृत मंत्रों का उल्लेख है:
जाग्रत मंत्र:
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते। त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत्सुप्तमिदं भवेत्॥ उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वाराह दंष्ट्रोद्धृत वसुन्धरे। हिरण्याक्ष प्राणघातिस्त्रैलोक्ये मङ्गलम् कुरु॥
मंत्र का अर्थ: हे गोविन्द! उठिए, उठिए। हे जगत्पते! अपनी योगनिद्रा का त्याग करें। हे जगन्नाथ! आपके सो जाने पर यह संपूर्ण जगत सुप्त हो जाता है। हे वराहावतार! हे हिरण्याक्ष नामक महादानव का वध करने वाले प्रभु! उठिए और त्रिलोकी का मंगल कीजिए।
इस समय यजमान सूप या थाली बजाकर भी लोक-परंपरा के अनुसार भगवान को जाग्रत करते हैं।





