विस्तृत उत्तर
पौराणिक मान्यता के अनुसार, सृष्टि के प्रारंभ में चारों ओर अंधकार एवं शून्यता थी। तब माता आदिशक्ति ने कूष्मांडा के रूप में प्रकट होकर एक हल्का हास्य किया, जिसकी ऊष्मा से एक छोटा सा अंड (ब्रह्माण्ड) उत्पन्न हुआ।
यही ब्रह्मांडीय अंड आगे चलकर पूरे विश्व का आधार बना।
उनके भीतर समाहित प्रकाश से ही दसों दिशाएँ उज्ज्वलित हुईं।
एक अन्य विश्वास के अनुसार, माँ कूष्मांडा अपने सुप्त रूप में वैकुण्ठ में विष्णु भगवान के हृदय में विराजमान थीं और सृष्टि की इच्छा होने पर उन्होंने प्रसन्न मुख से हँसकर ब्रह्माण्ड की रचना की।
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