विस्तृत उत्तर
शास्त्रसम्मत महामृत्युंजय अनुष्ठान 'रुद्राभिषेक' के बिना अपूर्ण माना जाता है। अनुष्ठान के दौरान रुद्राभिषेक का किया जाना इस पूरी प्रक्रिया को अत्यंत शक्तिशाली और फलीभूत बना देता है।
सवा लाख महामृत्युंजय मंत्रों के निरंतर जप से असीम 'ऊष्मा' (Heat/Tapas) और तीव्र ऊर्जा उत्पन्न होती है। शिवलिंग स्वयं ब्रह्मांडीय ऊर्जा का एक अति-संवेदनशील केंद्र है। इस तीव्र ऊष्मा को शांत और संतुलित करने के लिए ही शीतल द्रव्यों से शिवलिंग का निरंतर अभिषेक किया जाता है।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से, अभिषेक की यह परंपरा समुद्र मंथन से जुड़ी है। जब समुद्र मंथन के दौरान हलाहल विष निकला, तो संपूर्ण सृष्टि को बचाने के लिए भगवान शिव ने उसे पी लिया। उस विष के भयंकर ताप को शांत करने के लिए ही देवताओं ने गंगाजल और दूध से शिव का अभिषेक किया था।





