विस्तृत उत्तर
दिव्य दृष्टि' = अज्ञा चक्र (तीसरा नेत्र) की सक्रियता — सामान्य दृष्टि से परे 'देखने' की क्षमता।
शास्त्रीय
- ▸पतंजलि (3.32): 'मूर्ध्ज्योतिषि सिद्धदर्शनम्' — मस्तक के ज्योतिष्मान प्रकाश में सिद्ध पुरुषों का दर्शन।
- ▸कुण्डलिनी योग: अज्ञा चक्र सक्रिय = अंतर्ज्ञान, भविष्य बोध, सूक्ष्म जगत दर्शन।
- ▸ॐ जप = अज्ञा चक्र सीधे प्रभावित।
परंतु
- ▸'दिव्य दृष्टि' = वर्षों/दशकों की गहन साधना — रातोंरात नहीं।
- ▸भौतिक 'तीसरी आँख' नहीं खुलती — प्रतीकात्मक।
- ▸अंतर्ज्ञान (intuition) बढ़ना = प्रारंभिक 'दिव्य दृष्टि'।
- ▸अतिशयोक्ति और भ्रामक दावों से बचें।
- ▸गुरु मार्गदर्शन अनिवार्य।





