विस्तृत उत्तर
पार्वती' शब्द संस्कृत के 'पर्वत' शब्द से व्युत्पन्न है। पूर्व जन्म में सती के रूप में देह त्यागने के पश्चात, आदि पराशक्ति ने हिमालय के राजा हिमावन (हिमांचल) और रानी मेनावती (मैना) की पुत्री के रूप में अवतार लिया था। हिमालय को पर्वतों का राजा कहा जाता है। संस्कृत में 'शैल' का अर्थ पर्वत होता है, इसीलिए उन्हें 'शैलपुत्री' (पर्वत की पुत्री) के नाम से भी जाना जाता है।
दार्शनिक दृष्टि से देखा जाए तो पर्वत जड़ता, अचल दृढ़ता, स्थिरता और कठोर तपस्या का प्रतीक है। देवाधिदेव महादेव, जो स्वयं परम वैरागी और स्थिर चेतना के स्वामी हैं, उन्हें धारण करने के लिए किसी ऐसी ही अचल और स्थिर आधार की आवश्यकता थी। माता पार्वती का यह नाम उनकी अचल निष्ठा, अडिग संकल्प और तपस्या की कठोरता को प्रमाणित करता है।
उत्तराखंड के चमोली जिले में उन्हें 'नंदा' के रूप में भी पूजा जाता है, जहाँ उनकी स्मृति में नंदा राजजात का आयोजन होता है।





