विस्तृत उत्तर
भूवैज्ञानिकों के अनुसार, पृथ्वी की टेक्टोनिक प्लेट्स में खिसकाव (भूकंपीय गतिविधियों) के कारण सरस्वती नदी का मार्ग अवरुद्ध हो गया। इस प्राकृतिक परिवर्तन के कारण यमुना और सतलुज जैसी विशाल सहायक नदियाँ, जो पहले सरस्वती में अपना जल गिराती थीं, सरस्वती से अलग हो गईं। ग्लेशियरों (हिमनदों) से मिलने वाली जल आपूर्ति कट जाने और उस क्षेत्र में मानसून की तीव्रता कम होने के कारण यह महान नदी रेगिस्तान में सूखने लगी।
हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक श्राप के कारण सरस्वती नदी भूमिगत होकर पाताल में चली गई और पश्चिम से पूर्व की ओर बहने लगी, तथा नैमिषारण्य के पास 'सप्त सारस्वत' नामक स्थान पर पहुँची।





