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विस्तृत उत्तर
जय और विजय को श्राप इसलिए मिला क्योंकि उन्होंने सनकादिक मुनियों को वैकुण्ठ के सप्तम द्वार पर रोक दिया। वे मुनियों को बालक समझ बैठे और उनके आत्मज्ञान तथा दिव्य स्थिति को पहचान नहीं पाए। वैकुण्ठ में अपना-पराया या शत्रु-मित्र का भाव नहीं होता, लेकिन जय-विजय ने संदेह और अहंकार दिखाया। सनकादिक मुनियों ने इसे वैकुण्ठ के योग्य आचरण नहीं माना। इसलिए उन्होंने उन्हें भौतिक जगत में असुर योनि में जन्म लेने का श्राप दिया।
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