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सनातन धर्म प्रश्नोत्तरी — 13772 प्रश्न

शास्त्रों और पुराणों पर आधारित प्रामाणिक प्रश्न-उत्तर — कुल 13772 प्रश्न

श्राद्ध फल

द्वितीया श्राद्ध से सुयोग्य दामाद कैसे मिलता है?

द्वितीया श्राद्ध से सुयोग्य दामाद पितरों के विशेष आशीर्वाद से मिलता है। कर्ता को काम्य भावना से संकल्प करके पूर्ण विधि-विधान से श्राद्ध करना चाहिए - कुतप मुहूर्त में, नैऋत्य दिशा में मुख करके, अपसव्य अवस्था में। कुश, तिल, सत्तू, घृत, मधु से पिण्डदान, पञ्चबलि और ब्राह्मण भोजन सब करें। तृप्त पितर कन्या के लिए अत्यंत सुयोग्य, श्रेष्ठ और धर्मनिष्ठ वर का संकेत देते हैं।

सुयोग्य दामादकन्या विवाहद्वितीया श्राद्ध
श्राद्ध फल

कन्यावेदिन का अर्थ क्या है?

कन्यावेदिन का अर्थ है सुयोग्य दामाद यानी कन्या के लिए श्रेष्ठ और धर्मनिष्ठ वर। कन्या का अर्थ है पुत्री, और वेदिन का अर्थ है पाने वाला। ऐसा वर जो हर दृष्टि से उपयुक्त, श्रेष्ठ चरित्र वाला, और धर्म-कर्म में समर्पित हो। द्वितीया श्राद्ध काम्य भावना से और पूर्ण विधि-विधान से करने पर पितरों के आशीर्वाद से ऐसे कन्यावेदिन की प्राप्ति होती है।

कन्यावेदिनसुयोग्य दामादश्रेष्ठ वर
श्राद्ध फल

द्वितीया श्राद्ध से कौन सा विशेष फल मिलता है?

द्वितीया श्राद्ध से दो विशेष काम्य फल मिलते हैं - कन्यावेदिन यानी अत्यंत सुयोग्य, श्रेष्ठ और धर्मनिष्ठ दामाद की प्राप्ति, और पशू वै यानी उत्तम कोटि के पशु-धन यानी गौ, अश्व आदि की प्राप्ति। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 में यह स्पष्ट है। यह तिथि सन्तान के विवाह की बाधाओं को दूर करने और आर्थिक समृद्धि के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

द्वितीया फलकन्यावेदिनपशु-धन
श्राद्ध दर्शन

काम्य कर्म क्या होता है?

काम्य कर्म वह कर्म है जो किसी विशेष इच्छा या कामना की पूर्ति के लिए किया जाता है। काम का अर्थ है कामना, और काम्य का अर्थ है कामना से सम्बन्धित। श्राद्ध भी एक काम्य कर्म है, क्योंकि याज्ञवल्क्य स्मृति में हर तिथि का अपना विशिष्ट काम्य फल बताया गया है। द्वितीया का काम्य फल कन्यावेदिन यानी सुयोग्य दामाद और पशु-धन की प्राप्ति है।

काम्य कर्मइच्छा पूर्तिद्वितीया फल
विश्वेदेव

क्रतु-दक्ष विश्वेदेव क्या हैं?

क्रतु और दक्ष विश्वेदेवों की एक जोड़ी हैं, जो पार्वण श्राद्ध में पुरूरवा-आर्द्रव के विकल्प के रूप में आहूत होते हैं। क्रतु एक प्राचीन ऋषि थे, और दक्ष एक महान प्रजापति। दोनों यज्ञ-कर्म के विशेष ज्ञाता थे। इनकी उपस्थिति श्राद्ध को यज्ञ-स्वरूप बनाती है। शास्त्रों में अथवा शब्द से दोनों जोड़ियों को विकल्प के रूप में रखा गया है, और स्थानीय परम्परा के अनुसार किसी एक की स्थापना की जा सकती है।

क्रतुदक्षविश्वेदेव जोड़ी
विश्वेदेव

पुरूरवा-आर्द्रव कौन हैं?

पुरूरवा और आर्द्रव विश्वेदेवों की एक जोड़ी हैं, जो पार्वण श्राद्ध में आहूत होते हैं। पुरूरवा एक चन्द्रवंशी सम्राट थे, जो अत्यंत धर्मपरायण और विष्णु भक्त थे। उन्होंने पितरों की आकांक्षा को पूर्ण कर विधिपूर्वक श्राद्ध संपन्न किया, और अकूत ऐश्वर्य, धर्म तथा मोक्ष प्राप्त किया। आर्द्रव उनके सहचर देवता हैं। दोनों मिलकर श्राद्ध में हवि को पितरों तक पहुँचाने में सहायक होते हैं।

पुरूरवाआर्द्रवविश्वेदेव जोड़ी
श्राद्ध विधि

विश्वेदेव की स्थापना क्यों जरूरी है?

विश्वेदेव की स्थापना पार्वण श्राद्ध में अनिवार्य है क्योंकि वे हवि को पितरों तक पहुँचाने में सहायक होते हैं और श्राद्ध को सम्पूर्ण बनाते हैं। शास्त्र-विधान के अनुसार महालय के द्वितीया श्राद्ध में विश्वेदेवों की स्थापना अनिवार्य है। बिना इनके श्राद्ध अधूरा रह जाता है, हवि सूक्ष्म रूप में पितरों तक नहीं पहुँचती, और पितरों को पूर्ण तृप्ति नहीं मिलती।

विश्वेदेव स्थापनाअनिवार्यपार्वण श्राद्ध
श्राद्ध विधि

विश्वेदेव कौन हैं?

विश्वेदेव वे विशेष देवता हैं जो श्राद्ध में पितरों के साथ आहूत होते हैं और हवि को पितरों तक पहुँचाने में सहायक होते हैं। विश्व का अर्थ है सम्पूर्ण जगत्, और देव का अर्थ है देवता। महालय के द्वितीया श्राद्ध में विश्वेदेव दो जोड़ियों में स्थापित होते हैं - पुरूरवा और आर्द्रव अथवा क्रतु और दक्ष। पार्वण श्राद्ध में इनकी स्थापना अनिवार्य होती है।

विश्वेदेवपुरूरवा आर्द्रवक्रतु दक्ष
श्राद्ध विधि

क्या मातृ पक्ष का भी आवाहन होता है?

हाँ, पार्वण श्राद्ध में मातृ पक्ष का भी सतीक आवाहन होता है। मातृ पक्ष से तीन पीढ़ियाँ - मातामह यानी नाना, प्रमातामह यानी परनाना, और वृद्धप्रमातामह यानी वृद्ध परनाना - सब अपनी पत्नियों यानी मातामही, प्रमातामही, वृद्धप्रमातामही के साथ आहूत होते हैं। यह पितृ पक्ष की तीन पीढ़ियों के साथ मिलकर कुल बारह पितरों का सामूहिक आवाहन बनाता है।

मातृ पक्ष आवाहननाना नानीमातामह
श्राद्ध विधि

पार्वण में कितनी पीढ़ियों का आवाहन होता है?

पार्वण श्राद्ध में तीन पीढ़ियों का सतीक यानी पत्नी सहित आवाहन होता है। पितृ कुल से पिता, पितामह यानी दादा और प्रपितामह यानी परदादा। मातृ कुल से मातामह यानी नाना, प्रमातामह यानी परनाना और वृद्धप्रमातामह यानी वृद्ध परनाना। हर पुरुष पितर अपनी पत्नी के साथ आहूत होता है। कुल मिलाकर बारह पितरों का आवाहन होता है।

तीन पीढ़ियाँपार्वण आवाहनपितृ-मातृ पक्ष
श्राद्ध भेद

पार्वण श्राद्ध की क्या विशेषता है?

पार्वण श्राद्ध की मुख्य विशेषता तीन पीढ़ियों का सतीक आवाहन है। इसमें पिता, पितामह, प्रपितामह और मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह — सब अपनी पत्नियों के साथ आहूत होते हैं। साथ ही विश्वेदेवों यानी पुरूरवा-आर्द्रव या क्रतु-दक्ष की स्थापना अनिवार्य होती है। तीन पिण्ड बनते हैं, जो तीन पीढ़ियों के प्रतीक हैं। यह मुख्यतः पितृ पक्ष में होता है।

पार्वण श्राद्धतीन पीढ़ीविश्वेदेव
श्राद्ध भेद

सपिण्डीकरण श्राद्ध क्या है?

सपिण्डीकरण श्राद्ध वह श्राद्ध है जो मृत्यु के बारहवें या तेरहवें दिन किया जाता है, जिसमें मृत व्यक्ति की आत्मा को पितरों के साथ मिलाया जाता है। सपिण्ड का अर्थ है समान पिण्ड वाले बनाना। इसमें चार पिण्ड बनते हैं - एक मृत का और तीन पिता, पितामह, प्रपितामह के। मृत के पिण्ड को तीनों में मिलाकर वह प्रेत-योनि से मुक्त होकर पितृ-योनि में प्रवेश करता है।

सपिण्डीकरणमृत्यु पश्चातपितर मिलन
श्राद्ध भेद

वृद्धिश्राद्ध किसे कहते हैं?

वृद्धिश्राद्ध वह श्राद्ध है जो किसी वृद्धि या शुभ अवसर पर पितरों को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। इसे ही नान्दीमुख श्राद्ध भी कहते हैं। यह विवाह, उपनयन यानी जनेऊ, पुत्र-जन्म, गृह-प्रवेश, या यज्ञ से पहले होता है। इसमें हर्ष का भाव प्रबल होता है, और देवताओं का भी आवाहन होता है। पितरों के आशीर्वाद से शुभ कार्य निर्विघ्न सम्पन्न होता है।

वृद्धिश्राद्धनान्दीमुखशुभ कार्य
श्राद्ध भेद

नान्दीमुख श्राद्ध क्या है?

नान्दीमुख श्राद्ध वह विशेष श्राद्ध है जो किसी शुभ अवसर पर पितरों को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। नान्दी का अर्थ है आनन्द, और मुख का अर्थ है सम्मुख। इसे वृद्धिश्राद्ध भी कहते हैं। यह विवाह, उपनयन यानी जनेऊ, पुत्र-जन्म, गृह-प्रवेश, या यज्ञ से पहले होता है। इसमें पितरों के साथ देवताओं का भी आवाहन होता है, और भाव शुभ-हर्ष का होता है।

नान्दीमुख श्राद्धवृद्धिश्राद्धशुभ अवसर
श्राद्ध भेद

वार्षिक एकोद्दिष्ट कब करते हैं?

वार्षिक एकोद्दिष्ट हर साल पितर की मृत्यु तिथि पर किया जाता है। यह मृत्यु के ठीक एक वर्ष बाद यानी प्रथम वर्षी से शुरू होकर प्रतिवर्ष उसी मास और उसी तिथि पर लगातार किया जाता है। यदि मृत्यु ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया को हुई थी, तो प्रतिवर्ष ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया को ही श्राद्ध होगा। यह वंशज का स्थायी आजीवन कर्तव्य है।

वार्षिक एकोद्दिष्टबरसीमृत्यु तिथि
श्राद्ध भेद

एकोद्दिष्ट में कितने पिण्ड बनते हैं?

एकोद्दिष्ट श्राद्ध में केवल एक पिण्ड बनता है। यह पिण्ड उसी एक मृत व्यक्ति यानी उद्देश्य के लिए होता है, जिसकी मृत्यु तिथि पर श्राद्ध हो रहा है। पार्वण श्राद्ध में जहाँ तीन पीढ़ियों के लिए तीन पिण्ड बनते हैं, वहाँ एकोद्दिष्ट में केवल एक पिण्ड का ही दान होता है। पिण्ड सत्तू, काले तिल, घृत और मधु से बनाया जाता है।

एकोद्दिष्ट पिण्डएक पिण्डपिण्डदान
श्राद्ध भेद

क्षयाह श्राद्ध किसे कहते हैं?

क्षयाह श्राद्ध वह वार्षिक श्राद्ध है जो किसी पितर की मृत्यु तिथि पर हर वर्ष किया जाता है। क्षय का अर्थ है मृत्यु और अह का अर्थ है दिन, यानी मृत्यु का दिन। यह एकोद्दिष्ट श्राद्ध का ही दूसरा नाम है। यदि मृत्यु द्वितीया को हुई थी, तो प्रतिवर्ष द्वितीया को क्षयाह होगा। इसमें केवल एक पिण्ड का दान होता है, और तीन पीढ़ियों का आवाहन नहीं होता।

क्षयाह श्राद्धमृत्यु तिथिवार्षिक श्राद्ध
श्राद्ध भेद

एकोद्दिष्ट श्राद्ध क्या होता है?

एकोद्दिष्ट श्राद्ध वह श्राद्ध है जो किसी एक विशेष पितर को उद्दिष्ट करके प्रतिवर्ष उसकी मृत्यु तिथि पर किया जाता है। इसे क्षयाह श्राद्ध भी कहते हैं, क्योंकि यह क्षय यानी मृत्यु के दिन पर होता है। इसमें केवल उसी एक मृत व्यक्ति के लिए एक पिण्ड का दान होता है, और तीन पीढ़ियों का आवाहन नहीं होता। यह उसी मास की उसी तिथि पर हर साल होता है।

एकोद्दिष्टक्षयाह श्राद्धवार्षिक श्राद्ध
श्राद्ध भेद

श्राद्ध के मुख्य 4 भेद कौन से हैं?

श्राद्ध के मुख्य चार भेद हैं — पार्वण, एकोद्दिष्ट, नान्दीमुख यानी वृद्धिश्राद्ध, और सपिण्डीकरण। पार्वण श्राद्ध तीन पीढ़ियों का सामूहिक आवाहन वाला, एकोद्दिष्ट एक पितर के लिए वार्षिक क्षयाह, नान्दीमुख शुभ अवसरों पर वृद्धि के लिए, और सपिण्डीकरण मृत्यु के बाद आत्मा को पितरों में मिलाने के लिए। द्वितीया पर पार्वण और एकोद्दिष्ट दोनों होते हैं।

श्राद्ध भेदपार्वणएकोद्दिष्ट
तिथि शास्त्र

द्वितीया तिथि का अधिष्ठाता देवता कौन है?

द्वितीया तिथि का मुख्य अधिष्ठाता देवता यमराज हैं, जिनका इस तिथि पर विशेष आधिपत्य रहता है। पद्म पुराण के अनुसार यमुना ने यमराज को इसी तिथि पर भोजन कराया था। श्राद्ध के मूल अधिष्ठाता देवता वसु, रुद्र और आदित्य हैं, जो क्रमशः पिता, पितामह और प्रपितामह पीढ़ियों के प्रतिनिधि हैं। साथ ही विश्वेदेव पुरूरवा-आर्द्रव या क्रतु-दक्ष भी आहूत होते हैं।

यमराजद्वितीया अधिष्ठातावसु रुद्र आदित्य
श्राद्ध विधि

द्वितीया श्राद्ध में किसका आवाहन होता है?

द्वितीया श्राद्ध में पार्वण विधि से तीन पीढ़ियों का सतीक आवाहन होता है। पितृ पक्ष से पिता, पितामह, प्रपितामह और मातृ पक्ष से मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह — सब अपनी पत्नियों के साथ आहूत होते हैं। साथ ही विश्वेदेवों यानी पुरूरवा-आर्द्रव या क्रतु-दक्ष की स्थापना अनिवार्य है। श्राद्ध के अधिष्ठाता देवता वसु, रुद्र और आदित्य भी उपस्थित होते हैं।

आवाहनतीन पीढ़ियाँविश्वेदेव
तिथि श्राद्ध

क्या द्वितीया स्वाभाविक मृत्यु वालों के लिए है?

हाँ, द्वितीया श्राद्ध मुख्यतः स्वाभाविक मृत्यु वाले पितरों के लिए है। यदि स्वाभाविक मृत्यु द्वितीया को हुई हो, तो श्राद्ध भी द्वितीया को होगा। परंतु अकाल मृत्यु शस्त्र-विष-दुर्घटना से द्वितीया को हुई हो, तो श्राद्ध चतुर्दशी को होगा। सधवा स्त्री का नवमी को, संन्यासी का द्वादशी को, और तिथि अज्ञात हो तो सर्वपितृ अमावस्या को।

स्वाभाविक मृत्युद्वितीया अधिकारश्राद्ध अपवाद
तिथि श्राद्ध

द्वितीया तिथि को मरे व्यक्ति का श्राद्ध कब होता है?

द्वितीया तिथि को स्वाभाविक रूप से मरे व्यक्ति का श्राद्ध भी द्वितीया तिथि को ही होता है। शुक्ल या कृष्ण दोनों पक्षों में मृत्यु पर समान नियम है। मृत्यु दिन में हुई हो या रात में, मृत्यु के समय जो तिथि थी, वही श्राद्ध तिथि मानी जाती है। परंतु अकाल मृत्यु पर चतुर्दशी, सधवा पर नवमी, और संन्यासी पर द्वादशी को श्राद्ध होगा।

द्वितीया मृत्युश्राद्ध तिथिस्वाभाविक मृत्यु
श्राद्ध विधि

द्वितीया श्राद्ध कितने बजे करें?

द्वितीया श्राद्ध दिन के अपराह्न काल में करना चाहिए। सबसे श्रेष्ठ समय है कुतप मुहूर्त 11:36 AM से 12:24 PM तक। फिर रौहिण मुहूर्त 12:24 PM से 01:12 PM तक, और अपराह्न काल 01:12 PM से 03:39 PM तक। ये समय स्थानीय सूर्यास्त के अनुसार परिवर्तित हो सकते हैं। प्रातःकाल और रात्रिकाल में श्राद्ध सर्वथा वर्जित है।

कुतप मुहूर्तरौहिण मुहूर्तअपराह्न काल

विषय-वार प्रश्नोत्तर

🙏पूजा विधि📿मंत्र जाप विधि🔱शिव पूजा🔮तंत्र साधना🏠वास्तु शास्त्र💭सपनों का मतलब🪐ज्योतिष उपाय🙏व्रत उपवास🔥देवी पूजा🧘ध्यान साधना🛕तीर्थ यात्रा🔥हवन यज्ञ📜स्तोत्र पाठ🐘गणेश पूजा🙏विष्णु भक्ति📖सनातन दर्शन🕯️श्राद्ध पितृ कर्म🎗️संस्कार विधि❤️भक्ति साधनाधार्मिक उपाय

सनातन धर्म प्रश्नोत्तरी — शास्त्रीय ज्ञान

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