विस्तृत उत्तर
ग्रंथों में अर्जुन द्वारा गरुडास्त्र के लिए की गई किसी विशिष्ट तपस्या का विस्तृत वर्णन नहीं मिलता, लेकिन यह पुष्टि की गई है कि यह अस्त्र उनके शस्त्रागार का हिस्सा था। इसका सबसे तार्किक निष्कर्ष यह है कि उन्हें यह अस्त्र उस संपूर्ण दिव्य शस्त्रागार के हिस्से के रूप में प्राप्त हुआ था जो उन्हें उनके पिता देवराज इंद्र द्वारा देवलोक में उनके प्रवास के दौरान प्रदान किया गया था। यह भगवान शिव से पाशुपतास्त्र प्राप्त करने में उनकी सफलता का पुरस्कार था।
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