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विस्तृत उत्तर
अर्जुन की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर अनेक लोकपाल देवताओं ने उन्हें दिव्यास्त्र प्रदान किए। यमराज ने उन्हें यमदण्ड या दण्डास्त्र दिया। इसके साथ ही वरुण देव ने उन्हें अपना पाश प्रदान किया। कुबेर ने उन्हें 'अंतर्धान-अस्त्र' दिया। इससे पहले भगवान शिव ने उन्हें पाशुपतास्त्र प्रदान किया था। इस प्रकार अर्जुन का तरकश उन दिव्यास्त्रों से भर गया जो युद्ध में किसी भी शत्रु का सामना करने में सक्षम थे।
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