विस्तृत उत्तर
कालसर्प दोष = कुंडली में सभी 7 ग्रह (सूर्य-शनि) राहु-केतु के बीच एक ओर हों।
पहचान
- 1राहु-केतु अक्ष — राहु और केतु कुंडली में 180° विपरीत होते हैं (सदैव)।
- 2सभी ग्रह एक ओर — यदि शेष 7 ग्रह (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि) राहु से केतु तक एक ही ओर हों = कालसर्प दोष।
- 312 प्रकार — अनंत, कुलिक, वासुकि, शंखपाल, पद्म, महापद्म, तक्षक, कर्कोटक, शंखचूड़, घातक, विषधर, शेषनाग — राहु-केतु की भाव स्थिति अनुसार।
लक्षण (सामान्य): बार-बार सांप का सपना, अचानक बाधा, कार्य में असफलता, संतान कठिनाई, विवाह विलंब।
ज्योतिषी से जांच: कुंडली दिखाकर पुष्टि कराएं। सभी कालसर्प दोष = समान नहीं; कुछ हल्के, कुछ तीव्र।
स्पष्टीकरण: कालसर्प दोष = आधुनिक ज्योतिष अवधारणा। प्राचीन ज्योतिष ग्रंथों (बृहत् पाराशर होरा, जातक पारिजात) में 'कालसर्प दोष' शब्द नहीं मिलता। यह अपेक्षाकृत नवीन अवधारणा है। कुछ विद्वान इसे अत्यंत प्रभावशाली मानते हैं; कुछ इसकी शास्त्रीय प्रामाणिकता पर प्रश्न उठाते हैं।





