विस्तृत उत्तर
रामायण और महाभारत काल में ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र या नारायणास्त्र जैसे दिव्यास्त्र भौतिक हथियार (जैसे लोहे के बम) नहीं थे, बल्कि वे विशुद्ध रूप से 'मंत्र ऊर्जा' द्वारा संचालित अस्त्र थे। प्राचीन ऋषि और योद्धा ध्वनि विज्ञान (Cymatics) और क्वांटम ऊर्जा के गहरे ज्ञाता थे।
योद्धा अपने कठोर तपोबल से ब्रह्मांड की किसी विशिष्ट ऊर्जा (जैसे अग्नि, वायु या विद्युत) को जाग्रत करते थे। युद्ध के समय वे एक सामान्य बाण, लकड़ी या केवल एक तिनके (कुशा की घास) को हाथ में लेकर उस विशिष्ट मंत्र का मानसिक या सस्वर उच्चारण करते थे। मंत्र की तीव्र ध्वनि और योद्धा की संकल्प शक्ति उस साधारण वस्तु के भीतर परमाणु ऊर्जा (Atomic Energy) का संचार कर देती थी, जिससे वह तिनका भी ब्रह्मांडीय विनाश करने वाले दिव्यास्त्र में बदल जाता था। यह पदार्थ (Matter) और ऊर्जा (Energy) के मंत्र द्वारा एकीकरण का विज्ञान था।





