विस्तृत उत्तर
समुद्र मंथन के समय स्वरभानु नामक असुर ने देवों का वेष धरकर अमृत पान कर लिया। भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।
अमृत के प्रभाव से सिर (राहु) और धड़ (केतु) दोनों अमर हो गए और उन्हें नवग्रहों में स्थान मिला।





