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विस्तृत उत्तर
समुद्र मंथन में रस्सी का कार्य नागराज वासुकी ने किया था। वासुकी नाग को मंदराचल पर्वत के चारों ओर लपेटा गया और देवताओं तथा असुरों ने उसके दोनों सिरों को पकड़कर मंथन किया। असुरों ने अहंकार के कारण वासुकी का मुख पकड़ा, जबकि देवताओं ने उसकी पूंछ पकड़ी। मंथन के समय वासुकी के मुख से विषैली फुफकार और धुआं निकला, जिससे असुरों को बहुत कष्ट हुआ। वासुकी का रस्सी बनना इस कथा में सहयोग, सहनशीलता और ब्रह्मांडीय श्रम का महत्त्वपूर्ण प्रतीक है।
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