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विस्तृत उत्तर
कूर्म भगवान की पीठ पर पर्वत इसलिए रखा गया क्योंकि मंदराचल समुद्र में डूब रहा था। मंथन के लिए पर्वत को स्थिर धुरी की तरह घूमना था, पर जल में उसका कोई आधार नहीं था। भगवान विष्णु ने कूर्म रूप धारण करके अपनी पीठ को उस धुरी का आधार बनाया। कछुए की पीठ कठोर, गोल और भार सहने योग्य होती है, इसलिए यह रूप इस कार्य के लिए उपयुक्त था। जब पर्वत भगवान की पीठ पर टिक गया, तब समुद्र मंथन आगे बढ़ा और रत्नों तथा अमृत की प्राप्ति संभव हुई।
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