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विस्तृत उत्तर
पुराणों में कूर्मावतार में भगवान की पीठ अत्यंत विशाल बताई गई है। श्रीमद्भागवत में उनके कच्छप रूप का विस्तार एक लाख योजन तक वर्णित मिलता है। यह आकार बताता है कि भगवान का कूर्म रूप साधारण कछुए जैसा नहीं था, बल्कि ब्रह्मांडीय स्तर का दिव्य आधार था। मंदराचल जैसे विशाल पर्वत को संभालने के लिए इतना ही महान और स्थिर रूप आवश्यक था। यह संख्या प्रतीकात्मक रूप से भी समझी जाती है, जिसका अर्थ है कि ईश्वर का आधार जीवों की कल्पना से कहीं अधिक विशाल और अचल है।
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