विस्तृत उत्तर
समुद्र मंथन के दौरान क्षीरसागर से माता लक्ष्मी स्वर्ण कमल पर आसीन होकर प्रकट हुईं। उनका रूप अत्यंत दिव्य, तेजस्वी और मंगलमय था। देवता, असुर, ऋषि और सभी लोक उनके सौंदर्य और ऐश्वर्य से मोहित हो गए। दुर्वासा ऋषि के श्राप के बाद लक्ष्मी जी क्षीरसागर में चली गई थीं, इसलिए उनका पुनः प्रकट होना देवताओं के लिए श्री और सौभाग्य की वापसी था। सभी ने उन्हें पाने की इच्छा की, लेकिन लक्ष्मी जी ने भगवान विष्णु को अपना शाश्वत पति और आश्रय चुना। इसके बाद वे विष्णु के वक्षस्थल में विराजमान हुईं।
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