विस्तृत उत्तर
शिव ने गजासुर का वध देवताओं और शिव-भक्तों की करुण प्रार्थना पर किया। काशी के वासियों की दुर्दशा और उनकी पुकार सुनकर भगवान शिव प्रकट हुए।
शिव पुराण के अनुसार जब काशी में गजासुर का अत्याचार असहनीय हो गया और भक्त त्राहि-त्राहि करने लगे, तब सभी देवता, ऋषि, शिवगण और काशीवासी मिलकर भगवान शिव की शरण में आए। उन्होंने शिव से प्रार्थना की कि वे उनके इस कष्ट का निवारण करें।
भक्तों की करुण पुकार सुनकर भगवान शिव ने अपना त्रिशूल उठाया और गजासुर से युद्ध करने पहुँचे। गजासुर और शिव के बीच भयंकर युद्ध हुआ। शिव ने अपने त्रिशूल से गजासुर पर प्रहार किया और उसे त्रिशूल के आगे लटका लिया।
मृत्यु निकट जानकर भक्त-भाव में आए गजासुर ने शिव से एक अंतिम इच्छा प्रकट की — 'प्रभो! मेरे शरीर का चर्म (खाल) आप धारण करें और मेरा पवित्र शव काशी में आपके लिंग रूप में प्रतिष्ठित हो।' शिव ने इसे स्वीकार किया और गजासुर की खाल धारण करके 'कृत्तिवासा' (गजचर्म धारण करने वाले) नाम से प्रसिद्ध हुए। उसका शव काशी में 'कृत्तिवासेश्वर' ज्योतिर्लिंग बना। गजासुर का सिर एक अन्य मत से गणेश जी के धड़ से जुड़ा।





