विस्तृत उत्तर
माता पार्वती ने शिव जी की आँखें क्षण-भर की चंचलता और खेल-भाव में ढकी थीं — परंतु इस एक क्षण की लीला से एक महत्वपूर्ण घटना घटित हो गई।
वामन पुराण के अनुसार, काशी में जब शिव ध्यानावस्था में बैठे थे, तब माता पार्वती का मन मस्ती में था। उन्होंने पीछे से आकर अपने कोमल हाथों से शिव जी की दोनों आँखें ढक दीं — यह एक शृंगारिक और खेल-भरा भाव था।
इस क्रिया का तात्काल परिणाम यह हुआ — चूँकि शिव की आँखें ही सूर्य और चंद्रमा के तुल्य सृष्टि का प्रकाश-स्रोत हैं, उनके ढकते ही पूरे ब्रह्मांड में एक पल के लिए घनघोर अंधकार छा गया। सम्पूर्ण जगत में हाहाकार मच गया — पेड़-पौधे मुरझाने लगे, प्राणी भयभीत हुए।
सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने अपना तृतीय नेत्र खोला। तृतीय नेत्र के खुलते ही पुनः प्रकाश हुआ और संसार बच गया। परंतु उस दिव्य नेत्र की भीषण उष्मा से माता पार्वती के माथे से पसीने की बूँदें टपकीं। उन बूँदों से एक विशालकाय, भयंकर मुख वाला बालक प्रकट हुआ जो जन्म से दृष्टि-दोष युक्त था। यही बालक 'अंधक' कहलाया। यह लीला यह संदेश देती है कि शिव की आँखें बंद होना अर्थात ज्ञान का अभाव ही जगत में अंधकार का कारण है।





